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Friday, 19 June 2020

अमेरिका और जेपी का वो आह्वान


आज  पांच जून यानी संपूर्ण क्रांति दिवस है। और इस पोस्ट से टंका अमेरिका का एक हालिया तसवीर है। आपके मन मे, खासकर युवा पीढ़ी के मन में सवाल उठ सकता है , इस तसवीर का संपूर्ण क्रांति या जेपी से क्या लेना-देना।

लेकिन मैंने संपूर्ण क्रांति दिवस को कुछ शब्दों में याद करने को सोचा तो यह तसवीर आँखों के सामने आ गई। अभी यह तसवीर वायरल जो हो रही!!

अमेरिका में  पुलिस के हाथों एक अश्वेत जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत के बाद  यह पूरी दुनिया में लोकतंत्र की रक्षा की प्रतीकात्मक तसवीर बनी हुई है। तसवीर में अमेरिकी पुलिसकर्मी एक घुटना ज़मीन पर टेके पुलिसिया हिंसा के लिए माफी मांग रहे हैं। यूस्टन के पुलिस प्रमुख आर्ट एकावीडो ने राष्ट्रपति ट्रंप को ज़िम्मेदारी से बोलने की नसीहत भी दी है। पुलिस की इस नसीहत को लोकतंत्र के हित में माना जा रहा है।

भारत के लोगों के लिए आज जेपी को याद करने का दिन है। बिहार आंदोलन या संपूर्ण क्रांति आंदोलन के दौरान पुलिसिया जुल्म चरम पर पहुँच गई थी। उंस वक्त जेपी ने पुलिस और सेना से क्या कहा था, पुराने लोगों को याद होगा।

जेपी ने पुलिस और सेना से असंवैधानिक एवं अनैतिक आदेशों को मानने से इनकार करने का आह्वान किया था। तत्कालीन सत्तासीन लोगों , उनके समर्थक दलों एवं इतिहासकारों ने जेपी के इस आह्वान को देशद्रोह बताया था। इनसबों ने मिलकर अगस्त क्रांति के नायक को देशद्रोही बताने की हिमाकत की थी। ऐसे नामी इतिहासकारों की  कतार है जिन्होंने जेपी के इस आह्वान को देशद्रोह बताने वाली हेंकड़ी अपनी किताबों में कैद कर रखी है।

लेकिन आज !!  जेपी के उंस आह्वान के 45 वर्ष बाद अमेरिकी पुलिस वही काम तो कर रही। और पुलिस के इस काम की दुनिया भर में सराहना हो रही। लोग कह रहे ऐसी ही वजहों से तो लोकतंत्र बचा हुआ है।

अमेरिकी पुलिस की कारवाई के पक्ष में आज वे लोग भी खड़े है जिन्होंने जेपी के आह्वान के लिए उन्हें  देशद्रोही करार दिया था।  ऐसे लोगों को नहीं पता  कि हकीकत को किताबों या आरोपों में नहीं झुठलाया जा सकता। देशद्रोही या देशभक्त की पहचान वक्त खुद कर लेता है। आरोपों या कुछ लिख देने  से यह पहचान नहीं बनती। ###

तवारीख़ में बारह जून


तारीखें आती हैं, चली जाती हैं। लेकिन इक्का-दुक्का तारीखें तवारीख़ बन जाती हैं। 12 जून भी एक ऐसी ही तारीख है।
12 जून मतलब साल 1975 का 12 जून।  इस तारीख को ही इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक फैसला आया था। जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने अपने इस फैसले में रायबरेली से इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दिया था। यह महज एक फैसला नहीं था।बल्कि पूरी सल्तनत की नींद  इस फैसले ने  उड़ा दी थी। अब क्या होगा का सवाल राजनीतिक गलियारों में चारो ओर छितरा गया था। आगे के दिन में सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले को अंतरिम रूप से स्थगित किया। लेकिन इंदिरा गांधी को तसल्ली नहीं मिली। फैसले के तेरहवे दिन 25 जून को आखिरकार इंदिरा गांधी ने  आपातकाल लगाकर फैसले की तेरहवीं कर दी। यह अलग बात है बाद में इंदिरा गांधी को इस फैसले की भारी कीमत चुकानी पड़ी। ##

Wednesday, 5 June 2019

याद आ रहा है 1971 का चुनाव।पांचवी लोकसभा चुनाव का चुनाव 1972 के बजाय 1971 में ही हो गया था। इस चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस (आई) को प्रचंड जीत मिली थी। लोकसभा के कुल 518 सीटों में से 352 पर इंदिरा कांग्रेस के उम्मीदवार जीते थे।
उस वक्त मैं 14 साल का था। लेकिन मन में कांग्रेस विरोध कुलबुलाने लगा था। जिले के  अखबार में लिखना भी शुरू कर चुका था।   इंदिरा गांधी को प्रचंड विजय मिली तो एक छोटे साप्ताहिक गया समाचार में मेरा  लेख छपा। इस लेख में मैंने लिख दिया था, "जनता ने लोकतंत्र के साथ जो गद्दारी की है उसकी सजा उसे मिलेगी।" बाद में सयाना हुआ और समझ बढ़ी तो  मुझे अपनी इस मूर्खता का एहसास हुआ। यह एक किशोरमन की त्वरित प्रतिक्रिया थी जिसमें विवेक पर गुस्सा हावी था। लेकिन आज देख रहा हूँ कि मोदी को शानदार कामयाबी मिलने के बाद स्थापित दलों के साथ-साथ  पढ़े-लिखे बौद्धिक लोग भी इस जीत को पचा नहीं पा रहे तो आश्चर्य होता है । सोचना पड़ रहा कि एक किशोरमन की प्रतिक्रिया और बौद्धिक प्रतिक्रिया में अंतर कहाँ रह गया है। आज कोई जनता को मूर्ख बता रहा तो कोई कह रहा लोकतंत्र मूर्खों का ही शासन है। तरह-तरह से जनता को कोसा जा रहा और जनादेश को स्वीकार करने या उसका सम्मान करने से इंकार किया जा रहा। यह सब अपना दोष दूसरे पर मढ़ने जैसा है। याद रखना चाहिए कि जनादेश का सम्मान नहीं कर आप लोकतंत्र में ही अविश्वास कर रहे। सम्मान का मतलब नतमस्तक होना नहीं होता। आपके पास अगले चुनाव में जनादेश को अपने पक्ष में कर लेने का पूरा मौका है। 1971 के बाद 1977 में हुए चुनाव का नतीजा याद होगा। लेकिन अगर आप जनता को ही अविश्वास की नजरों से देखने लगेंगे, उसे मूर्ख बताकर अपने अहं की तुष्टि में लग जायेंगे तो 1977 की तरह 2024  नहीं हो पायेगा। आपको सोचना है कि क्या आप 2024 को 1977 बनाने को तैयार हैं? फिलहाल तो उसका कोई संकेत नहीं मिल रहा। लेकिन वक्त है । अनुभवों से सीख लेना होगा।खुद में सुधार करना होगा। तब वह हो सकता है। जनादेश का सम्मान कीजिए और अगले जनादेश को अपने पक्ष में करने की कोशिश शुरू कीजिए। जनता और जनादेश को नकार कर नया जनादेश नहीं हासिल कर सकते।

Sunday, 12 May 2019


चाहत और आकलन में अंतर होता है।चुनाव को लेकर मेरी चाहत और निरंतर चल रहे आकलन के बीच गहरी खाई बनी रही। मैं इस खाई को पाटने की कोशिश करता रहा, लेकिन नाकामयाब रहा। मेरी चाहत और अनुमान का अंतर बना रहा।
मेरे आकलन के अनुसार आभासी दुनिया में मोदी विरोध की जो लहर चल रही वह जमीन पर नहीं दिख रही। विपक्ष मोदी के खिलाफ मुद्दों को सही तरीके से उछालने और वोटरों को प्रभावित करने में लगभग नकारा साबित हुआ है। विपक्ष के आभासी हमलों का कोई  असर वोट पर पड़ता नहीं दिख रहा। अगर लहर की बात करें तो वह सिर्फ मोदी की है। हालांकि उसकी रफ्तार 2014 वाली नहीं है। इस लहर के खिलाफ अगर जमीन पर कहीं कुछ है तो वह जातीय समीकरण। लेकिन यह जातीय समीकरण  विशेष रूप से युवाओं को प्रभावित नहीं कर पा रहा। जातीय घेरे से इतर जाकर गैर राजनीतिक युवाओं का बहुलांश मोदी के साथ है। बहुत कम क्षेत्र हैं जहां उम्मीदवार का व्यक्तित्व प्रभावी हो रहा है।  अब मोदी की कम रफ्तार वाली लहर को जातीय समीकरण कितना बांध पाता है यह सही - सही 23 मई को पता लगेगा।
मुझे पता है मेरी चाहत की तरह मेरे अधिकांश मित्रों को भी मेरा यह आकलन पच नहीं पायेगा। लेकिन मुझे बता देने से क्या फर्क पड़ता ।मैं कोई तीस मार खां तो हूँ नहीं जो इससे किसी को कोई नुकसान होगा।



Sunday, 24 January 2010

‘... पापा, कोई अच्छे नेता तो नहीं थे ज्योति बसु ’

ज्योति बसु के द्वारा मरणोपरांत अंगदान किए जाने के बाद पश्चिम बंगाल में अंगदान करने की घोषणा करने वालों की कतार लग गई है। ज्योति बसु ने पश्चिम बंगाल के एक एनजीओ गण दर्पण से अंगदान का वादा किया था। इसी वादे के तहत ज्योति बसु की अंतिम यात्रा के बाद उनका शरीर कोलकाता के एसएसकेएम हास्पीटल को सौंप दिया गया।

गण दर्पण मरणोपरांत अंगदान करने के लिए लोगों को प्रेरित करने के काम में 1985 से लगा हुआ है। 1985 से ज्योति बसु की मृत्यु के पहले तक 1400 लोग अंगदान का वादा गण दर्पण से कर चुके थे।  लेकिन ज्योति बसु की मृत्यु के बाद के दो दिनों के अंदर ही तीन सौ लोग अंगदान का वादा लेकर सामने आए। निश्चित तौर पर ज्योति बसु से प्रेरित होकर ही इतनी बड़ी संख्या में लोगों ने पारंपरिक अवधारणाओं को त्यागने का साहस दिखाया है। यह एक बड़ी बात है।

इतनी बड़ी संख्या में अंगदान करने की घोषणा से जुड़ी खबर जब मैं अपनी बेटी को पढ़ने को दिया, तो उसका सवाल सुन कर स्तब्ध हो गया। बेटी का सवाल था, ‘पापा, ज्योति बसु कोई बहुत अच्छे नेता तो नहीं थे न।’ मैंने जब उससे पूछा कि यह तुम कैसे कह रही हो, तो उसका जवाब था, ‘अखबारों में जो ढेर सारे लेख पढ़े, उससे तो ऐसा ही लगता है।’ बेटी के इस जवाब ने मुझे अंदर तक झकझोर कर रख दिया।

मेरी बेटी अभी ग्यारहवीं की छात्रा है। राजनीति में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं। लेकिन खुद को सामयिक घटनाओं से वाकिफ रखने के लिए वह घर पर रोजाना आने वाले लगभग हर अखबार को देखती-पढ़ती है। बेटी के जवाब के बाद जब मैंने सोचा तो एहसास हुआ कि देश की किशोर - युवा पीढ़ी को मीडिया से किस तरह की जानकारी मिल रही है। अखबार पढ़ने वालों से लेकर देश की पूरी आबादी में इसी आयु वर्ग के लोग सबसे अधिक हैं। बार-बार इस बात को दोहराया जाता है कि इसी वर्ग पर देश का भविष्य निर्भर करता है। यह वर्ग जैसा बनेगा, वैसा ही देश बनेगा। यहां पर सवाल उठता है, हमारी मीडिया जो जानकारी परोस रही है , उससे भविष्य का देश कैसा बनेगा। 

निश्चित तौर पर अखबारों में और खासकर अंग्रेजी अखबारों में ज्योति बसु की मृत्यु के बाद जितनी बातें छपी हैं, उनमें उन्हें विकास विरोधी साबित करने की ही कोशिश हुई है। बहुत मामूली तरीके से उनके सही कामों को हल्के ढ़ंग से कहीं-कहीं लिखा गया है।

इस बात को कोई खास अहमियत नहीं दी गई कि ज्योति बसु ने मर कर भी दो लोगों की आंखों को रोशनी दी। अगर उनका अधिकांशः अंग बेकार नहीं हुआ होता तो कई और लोगों को नई जिंदगी मिलती। मीडिया में इस बात को लेकर कोई खास चर्चा नहीं हुई कि आज कितने लोग हैं जो अपनी बात और विश्वास पर अडिग रहते हैं। यहां तो ऐसे नास्तिकों की भरपार है जो कुर्सी पाने के पहले तो प्रगतिशीलता का जामा पहन कर खुद को नास्तिक बता देते हैं, लेकिन कुर्सी मिलते ही उनकी सोच और मिजाज बदल जाते हंै। कुर्सी कहीं चली न जाए, इसके लिए वे उन हर कर्मों को करने को तैयार रहते हैं, जिसके पहले वे विरोधी हुआ करते थे।

यह गिनाने की जरूरत किसी ने नहीं समझी कि आज देश में कौन ऐसा नेता है जो अपनी कुर्सी पूरी तरह सुरक्षित रहने के बावजूद पार्टी से कहे कि मुझे पदमुक्त कर दो, मेरा शरीर अब काम का  बोझ बरदाश्त नहीं कर पा रहा। उन नमूनों की कोई चर्चा नहीं की गई जो अच्छी तरह इस बात को जानते हुए भी कि उन्हें सदन का बहुमत हासिल नहीं है, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो गए। उन लोगों के बारे में नहीं बताया गया जो लोग बूढ़े होने के बावजूद कुर्सी पर बरकरार हैं और कुर्सी पर रहते हुए ही अपना उत्तराधिकार अपने बेटे-बेटियों को दे रहे हैं।

खुल कर चर्चा नहीं की गई कि ज्योति बसु जब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने थे तो उनका राज्य अनाज के मामले में आत्मनिर्भर नहीं था। लेकिन बसु सरकार ने आपरेशन बरगा के जरिए भूमि सुधार का जो ऐतिहासिक काम किया, बटाइदारों और खेत मालिकों का जो रिश्ता बनाया , उसके कारण जो हरित क्रांति आई उसके बूते पश्चिम बंगाल आज अनाज का निर्यात करता है।

इस बात को स्वीकारने की कोशिश नहीं की गई कि पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि देश के स्तर पर सत्ता के एकाधिकार को तोड़ने में ज्योति बसु ने अहम भूमिका निभाई। साझा सरकार चलाने की मिसाल कायम की। ज्योति बसु 23 सालों तक लगातार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे। शुरुआती वर्षों में उनकी पार्टी माकपा को अकेले बहुमत नहीं था। इस कारण उन्होंने साझा सरकार चलाई। लेकिन बाद के वर्षों में माकपा को अकेले बहुमत हासिल हो जाने के बाद भी वाम मोर्चे के घटकों को  उन्होंने सरकार से बाहर जाने को नहीं कहा। बल्कि उनके साथ ही सरकार चलाते रहे। इसके अलावा दिल्ली में जितनी भी साझा सरकारें बनी उसमें ज्योति बसु ने बहुत ही सकारात्मक भूमिका अदा की।

आज जब देश में कुर्सी के लिए कुछ भी कर देने वालों की भीड़ है, वैसे राजनीतिक माहौल में ज्योति बसु इस देश के इकलौता नेता थे, जिन्हें लोकसभा में बहुमत वाला गठबंधन प्रधानमंत्री की कुर्सी देने को तैयार था, लेकिन पार्टी का आदेश मानते हुए वे उस कुर्सी पर नहीं गए।

ज्योति बसु ने सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष गठबंधन को मजबूती प्रदान की। उनका राज्य पश्चिम बंगाल हमेशा सांप्रदायिक दंगों से मुक्त रहा। फिर गुजरात दंगों के बाद केंद्र में सांप्रदायिक ताकतों को सत्तासीन होने से रोकने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई।

लेकिन इन सारी खूबियों के बावजूद वे ‘विकास पुरूष’ नहीं बन सके। हमारी मीडिया को सबसे बड़ी यही शिकायत है। इस शिकायत को पुष्ट करने की कोशिश में मीडिया उन्हें विकास का विरोधी साबित करने पर तुली हुई है। जबकि ज्योति बसु ने 2000 में कुर्सी छोड़ दी थी। उस वक्त तक देश का औद्योगिक विकास नए रास्ते ( उदारीकरण) पर रफ्तार नहीं पकड़ सका था। लगभग हर जगह एक ही जैसी स्थिति थी। फिर भी कम्युनिस्ट लगाम के कारण निवेश की मुश्किलें थीं। ज्योति बसु की विफलता रही कि वे औद्योगिक विकास का वैकल्पिक माडल अपने शासनकाल में नहीं दे सके। लेकिन इस विफलता के कारण उन्होंने दूसरे मोर्चों पर जो काम किया, उसे नजरअंदाज कर जाना कतई उचित नहीं है। यह सही है कि बेलगाम निवेश को रोक कर विकास कैसे हो, यह ज्वलंत प्रश्न दिनोंदिन ज्यादा जटिल होता जा रहा है। ज्योति बसु की यह जो विफलता रही, उसे ठीक करने का प्रयास देश के हित में नितांत जरूरी है।   

Sunday, 10 January 2010

ग्रोथ रेट को लेकर क्यों बरपा है हंगामा ?

बिहार इनदिनों आर्थिक संवर्धन (इकाॅनामिक ग्रोथ) को लेकर खासे चर्चा में है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) द्वारा जारी आंकड़े में बिहार का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) काफी बढ़ गया है। आंकड़े के अनुसार 2004से 2009 के बीच राज्य के जीडीपी में औसतन 11.03 प्रतिशत का सालाना इजाफा हुआ है। यह राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। पूरे देश में सिर्फ गुजरात के जीडीपी के ग्रोथ रेट का औसत बिहार से थोड़ा अधिक 11.06 प्रतिशत है।

इस खबर के आने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चुनावी वर्ष में एक बड़ा हथियार मिल गया है। साथ ही उनकी मुरीद मीडिया को सुशासन का भोंपू और तेजी से बजाने का मौका हाथ लग गया है। दोनों इस अवसर को लेकर इतने मदांध हैं कि उन्हें सही-गलत और असलियत को जानने-समझने या समझाने की कोई जरूरत नहीं रह गई है। इसी का नतीजा है कि इकाॅनामिक ग्रोथ को आर्थिक विकास ( इकाॅनामिक डेवलपमेंट) बताने की मुहिम छेड़ दी गई है। दोनों शब्दों (इकाॅनामिक ग्रोथ और इकाॅनामिक डेवलपमेंट) को पर्यायवाची बना कर परोसा जा रहा है।
जबकि इकाॅनामिक ग्रोथ और इकाॅनामिक डेवलपमेंट दो अलग-अलग चीजें हैं।

Wednesday, 6 January 2010

चोर की दाढ़ी में तिनका

 जीडीपी बढ़ने के आंकड़ों को विश्वसनीय बनाने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर उनके हमदर्द अखबार और पत्रकार तक झूठ का सहारा आखिर क्यों ले रहे हैं ? क्या इससे चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत सही नहीं साबित होती ?

हाल में एक आंकड़ा आया है। पिछले पांच साल (2004-09) के दौरान बिहार के सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) में सालाना औसतन 11. 03 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जीडीपी के मामले में बिहार उछल कर देश भर में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। इसके उपर सिर्फ गुजरात है, जहां का जीडीपी 11.06 प्रतिशत की दर से बढ़ा है। रविवार को इससे जुड़ी खबर और स्वामीनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर का लेख टाइम्स आफ इंडिया में छपने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बांछें खिल गई है। साथ ही उनके हमदर्द अखबारों और पत्रकारों को मानों मांगी मुराद मिल गई है। बिहार में फील गुड को एक नया आयाम मिल गया है।

लेकिन ‘जश्न’ के इस माहौल में कई बेतुकी बातें भी बहुत गर्व के साथ परोसी जा रही है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के द्वारा जारी इस आंकड़े को विश्वसनीयता प्रदान करने की हिमायत में मुख्यमंत्री ने कहा कि यह एक स्वतंत्र एजेंसी की रिपोर्ट है और मशहूर अर्थशास्त्री स्वामीनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर ने इस पर एक लेख लिखा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि क्या अय्यर और अमत्र्य सेन जैसे लोगों से कुछ भी लिखवा लिया जा सकता है। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि केंद्र सरकार ने भी हमारी उपलब्धियों को स्वीकारा है।

इसी तरह एक राष्ट्रीय दैनिक के संपादकीय में छपा कि ‘‘ यह आंकड़ा बिहार राज्य सरकार की किसी संस्था की तरफ से नहीं तैयार किया गया है, बल्कि यह केंद्रीय सांख्यिकी संगठन का आंकलन है। इसलिए इस पर राज्य सरकार के आत्म प्रचार की कोई छाया नहीं है।’’ इसी बात को उसी अखबार में छपे एक लेख में भी दुहराया गया है।
लेकिन यह दावा करने वालों को सचाई का पता ही नहीं है। सचाई यह है कि सीएसओ राज्य के विकास दर का कोई आंकड़ा न तो तैयार करता है और ना ही उसका विश्लेषण करता है। वह सिर्फ विभिन्न राज्य सरकारों के द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों को एक साथ जारी कर देता है।
इस संबंध में भारत सरकार के मुख्य सांख्यिकीविद् और केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव प्रणब सेन का कहना है कि ‘‘ सीएसओ राज्यों के जीडीपी का डाटा नहीं उपलब्ध कराता है। सीएसओ और राज्यों के बीच एक व्यवस्था बनी हुई है जिसके तहत राज्य सरकारें खुद अपने जीडीपी का अनुमानित डाटा सीएसओ को देती हैं और सीएसओ उसे जारी करता है। इन डाटा को सीएसओ सत्यापित नहीं करता है। इसलिए इसे सीएसओ का डाटा कहना उचित नहीं है। ’’
सेन के बयान को हम छोड़ भी दें और अगर भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम मंत्रालय की साइट पर जाकर देखें, जहां से इस डाटा को जारी किया गया है, तो राज्यवार डाटा के नीचे स्पष्ट तौर पर स्रोत अंकित है। इसमें लिखा हुआ है कि राज्यों के आंकड़े संबंधित राज्य के वित्त एवं सांख्यिकी निदेशालय के हैं जबकि भारत सरकार के आंकड़े सीएसओ के हैं।
 अब इसे क्या माने जाए ? कारपोरेट एक्सलेंस का अवार्ड जीतने वाले हमारे मुख्यमंत्री को इतनी छोटी सी जानकारी नहीं है या फिर वे जानबूझ कर जनता को भ्रमित कर रहे हैं? और फिर चैथे खंभे का काम सिर्फ दुम सहलाना ही रह गया है क्या? जिन्हें खुद चीजों की जानकारी नहीं, उनसे आप जानकारी पाने की उम्मीद कैसे कर सकेंगे।



Saturday, 12 December 2009

पैंतीस... मिंस... थर्टी फाइव !

मुहल्ले की दुकान पर एक दिन खड़ा था। 12-13 साल की एक लड़की आई और दुकानदार से कार्नफलैक्स देने को बोली।  दुकानदार ने रैक से निकाल कर कार्नफलैक्स दे दिया। लड़की ने पूछा, कितने पैसे दूं। दुकानदार बोला, पैंतीस रुपए। लड़की गुमशु रही। दुकानदार दो-तीन बार पैंतीस-पैंतीस कहता रहा। अंत में लड़की बोली, मिंस। तब दुकानदार बोला, थर्टी फाइव। थर्टी फाइव कहने पर लड़की समझ पाई, वह पैंतीस नहीं समझ पा रही थी।

  यह है हमारे बदलते मध्यवर्गीय समाज की तस्वीर। बच्चों को हिंदी के अक्षर और अंकों का ज्ञान भी नहीं हो पाता और अंग्रेजी बोलने लगते हैं। स्कूल से ज्यादा न्यू मीडिया चैनल, इंटरनेट का कमाल है, यह सब। दरअसल एक तरह से पूरी दुनिया में एक बार फिर से अंग्रेजी का दबदबा बढ़ने लगा है। अभी ब्रिटिश कौंसिल की एक रिपोर्ट आई है। इस रिर्पोट के बाद अंग्रेजी की वकालत करने वालों की बांछे खिल गई है। नई पीढ़ी के लोकप्रिय उपन्यासकार चेतन भगत से लेकर अंग्रेजी के अनेक अखबार बखान करने में लग गए हैं कि अंग्रेजी के सिवा कोई चारा नहीं। हिंदी के समर्थकों को मानों साप सूंघ गया है। वे करें तो करे क्या।

Tuesday, 8 December 2009

वाहवाही 24x7

बिहार में नीतीश सरकार के चार साल पूरे हो गए। इस मौके पर पिछले 24 नवंबर को राज्य में सरकारी स्तर पर काफी जोश-खरोश का माहौल रहा। सरकार ने अपनी उपलब्ध्यिां गिनाईं तो विपक्ष ने विफलताओं का रिकार्ड पेश किया। तात्कालिक तौर पर इस जश्न का सर्वाधिक फायदा मीडिया घरानों ने उठाया। राज्य के अखबारों में राज्य सरकार की ओर से काफी एडवरटोरियल छपे। सरकारी खजाने से करोडो रुपए मीडिया घरानों को दिए गए। इन एडवरटोरियलों को पढ़ने से सचमुच ऐसा लगता है कि बिहार में सुशासन स्थापित हो चुका है। ऐसे पहले से भी मुख्यमंत्राी को सुशासन बाबू का खिताब मीडिया वाले दे चुके हैं।
  मगर इन एडवरटोरियलों की अंदरूनी कहानी को जानने पर जो तथ्य सामने आते हैं वे काफी चैंकाने वाले हैं। सचाई यह है कि मीडिया वेश्यावृति पर उतर आई है। विज्ञापन के तौर पर जो एडवरटोरियल छपे हैं, उसे राज्य के सूचना व जनसंपर्क विभाग ने जारी तो जरूर किया है, लेकिन उसे तैयार किया है उन अखबारों ने जिन अखबारों में वे एडवेटोरियल छपे हैं।

प्रभाष जी के नहीं रहने पर

  जनसत्ता के संस्थापक संपादक प्रभाष जोशी अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनके निधन से हिंदी पत्रकारिता में एक गहरा धक्का लगा है। लेकिन उनके निधन के बाद अखबारों में खबरों और उनकी याद में लिखे गए लेखों को लेकर विवाद गहराया है और पत्रकारिता की साख गिरी है। प्रभाष जी के विचार या कर्म चाहे जो भी रहे हों, कोई उनसे सहमत हो या नहीं, लेकिन इतना तो जरूर है कि एक लंबे समय तक वे हिंदी पत्रकारिता के अग्रदूत बने रहे थे। ऐसे अग्रदूत के निधन की खबर को कुछ अखबारों ने जगह न देकर या समुचित जगह नहीं देकर उनका अपमान नहीं, वरन पत्रकारिता की साख के साथ खिलवाड़ किया है।

  दूसरी ओर उनके निधन पर ढेर सारे संस्मरण या उनकी याद में उनके गुणों को बयां करने वाले ढेर सारे लेख विभिन्न अखबारों में छपे हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश इनमें अधिकांश लेख एकतरफे नजरिए के साथ लिखे गए हैं।

किसे धोखा दे रही है मीडिया

प्रभात खबर के 17 नवंबर ,2009 के अंक में एक्सक्लूसिव लीड स्टोरी पढ़ा। लीड खबर का स्लग है, निवेशकों की पहली पसंद बना बिहार। शीर्षक है, 3 दिन 55 प्रस्ताव। खबर में बताया गया है कि नई दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में पहले तीन दिनों में बिहार इंडस्ट्रीयल एरिया डेवलपमेंट आथिर्रिटी को 55 से अधिक निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। और बिहार निवेशकों के बीच आकर्षण को केंद्र बना हुआ है। 247 वर्ग संेटीमीटर की लीड खबर में निवेश प्रस्तावों के बारे में इससे अधिक एक लाइन भी कुछ नहीं बताया गया है। पूरी खबर बियाडा की प्रबंध निदेशक के बयान से भर दिया गया है। इस बयान में नए प्रस्तावों के बारे में कुछ नहीं कहा गया है।

विकास से वंचित गरीबी व भूख

दुनिया भर में इक्कीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में तेज आर्थिक विकास हुआ। इस विकास के कारण गरीबी और भूख की समस्या थोड़ी कम हुई। लेकिन हालिया रिपोर्टों से खुलासा हुआ है कि भारत में गरीबी और भूख की समस्या पहले किये गये अनुमानों से कहीं अधिक है।

विश्व बैंक के ताजा अनुमानों के अनुसार दुनिया के करीब डेढ़ अरब लोग भीषण गरीबी की जिंदगी जी रहे हैं। इस डेढ़ अरब में भारत के गरीबों का हिस्सा एक तिहाई के करीब है। गरीबी के कारण इन करोड़ों लोगों को स्कूली शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी और सफाई की बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही। इसी तरह पिछले दिनों जारी अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार भी आर्थिक विकास के कारण भूखमरी की समस्या में कोई गुणात्मक कमी नहीं आयी है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के करीब 20 करोड़ लोगों को भूखे पेट सोना पड़ रहा है।